Wed, 30 Sep 2026 · IST English

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मटका किंग की असली कहानी

2026 की प्राइम वीडियो सीरीज़ मटका किंग देखने के बाद बहुत लोग इसकी असली कहानी खोज रहे हैं। सीरीज़ काल्पनिक है, लेकिन जिस दुनिया से यह कहानी ली गई है, वह बिल्कुल असली थी – और उसे दो लोगों ने बनाया: कल्याणजी भगत और रतन खत्री।

मटके से पहले: कपास के भाव पर सट्टा

आज़ादी से पहले बॉम्बे में "आंकड़ा जुगार" नाम का खेल चलता था। लोग कपास के खुलने और बंद होने के भाव पर दांव लगाते थे, जो न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज से टेलीप्रिंटर के ज़रिए बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज आते थे। 1961 में न्यूयॉर्क ने यह बंद कर दिया, तो खेल को नंबरों का नया ज़रिया चाहिए था। हल आसान था: पर्चियों या ताश के पत्तों पर नंबर, एक मिट्टी के घड़े यानी मटके में डालो और निकालो।

कल्याणजी भगत और वर्ली मटका

कल्याणजी भगत गुजरात के कच्छ से बॉम्बे आए थे और वर्ली में किराने का कारोबार करते थे। 1962 में उन्होंने वर्ली मटका शुरू किया, जो रोज़ नंबर घोषित करता था और जल्द ही शहर की मिलों और बाज़ारों में फैल गया। आज लाखों लोग जिस कल्याण बाज़ार को देखते हैं, वह उन्हीं के नाम पर है। 1990 के दशक की शुरुआत में उनके निधन के बाद उनके बेटे सुरेश ने कारोबार संभाला।

रतन खत्री: असली मटका किंग

रतन खत्री का जन्म लगभग 1932 में कराची के एक सिंधी परिवार में हुआ। बँटवारे के बाद वे बॉम्बे आ गए, जहाँ कपड़ा बाज़ार में काम करते हुए उन्होंने कपास के भाव वाला खेल सीखा। कुछ समय कल्याणजी भगत के साथ काम करने के बाद उन्होंने 1960 के दशक की शुरुआत में अपना मटका शुरू किया – जिसे "रतन" या "मेन बाज़ार" मटका के नाम से याद किया जाता है। आज का मेन बाजार उसी से जुड़ा है।

खत्री के ड्रॉ में मटके से ताश के पत्ते निकाले जाते थे, और बताया जाता है कि वे दांव लगाने वालों के सामने खोले जाते थे – लोगों के भरोसे की यही बड़ी वजह थी। रिपोर्टों के अनुसार 1980 और 90 के दशक में पूरे मटका कारोबार में हर महीने ₹500 करोड़ से ज़्यादा का सट्टा लगता था और 1995 तक अकेले बॉम्बे में 2,000 से ज़्यादा बुकी थे।

यह कारोबार कभी कानूनी नहीं था। इमरजेंसी (1975–77) के दौरान खत्री 19 महीने जेल में रहे। 1990 के दशक में उन्होंने मटका छोड़ दिया और 9 मई 2020 को दक्षिण मुंबई के ताड़देव स्थित अपने घर पर 88 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ।

क्या मटका किंग सच्ची कहानी है?

पूरी तरह नहीं। नागराज पोपटराव मंजुले के निर्देशन में बनी मटका किंग 17 अप्रैल 2026 को प्राइम वीडियो पर आई। इसमें विजय वर्मा ब्रिज भट्टी बने हैं – 1960 के बॉम्बे का एक परेशान कपास व्यापारी, जो हर रात 9 बजे तीन पत्ते निकालने वाला नया खेल शुरू करता है। ब्रिज भट्टी काल्पनिक किरदार है, जो रतन खत्री की ज़िंदगी से ढीले तौर पर प्रेरित है, उनकी जीवनी नहीं।

कृतिका कामरा गुलरुख बनी हैं, दक्षिण बॉम्बे की एक विधवा जो "मटका क्वीन" बनती है, और सई ताम्हणकर ब्रिज की पत्नी बरखा बनी हैं। सीरीज़ इतनी पसंद की गई कि प्राइम वीडियो ने मटका किंग 2 की घोषणा कर दी।

मटका पहले भी परदे पर आ चुका है: धर्मात्मा (1975) में प्रेम नाथ का किरदार खत्री पर आधारित था, और खत्री ने ख़ुद रंगीला रतन में पैसा लगाया और अभिनय किया। 2024 की तेलुगु फ़िल्म मटका (वरुण तेज) भी इसी दुनिया पर बनी है।

उसके बाद क्या हुआ

90 के दशक के बीच पुलिस की सख़्ती के बाद बुकी मुंबई छोड़कर दूसरे राज्यों में चले गए और 2000 के दशक तक कारोबार काफ़ी सिमट गया। लेकिन यह ख़त्म नहीं हुआ: नंबर फ़ोन, रिजल्ट वेबसाइटों और फिर ऐप पर आ गए। आज दर्जनों अलग बाज़ार रोज़ रिजल्ट घोषित करते हैं – देखें टाइम टेबल।

जो नहीं बदला, वह है कानून। भारत के ज़्यादातर हिस्सों में सट्टा मटका गैर-कानूनी जुआ है, और 1 मई 2026 से ऑनलाइन पैसे वाले खेलों और उनके विज्ञापन पर पूरी रोक है। पढ़ें: कानून क्या कहता है।

छोटे जवाब

असली मटका किंग कौन था?
रतन खत्री, जिन्होंने 1960 से 1990 के दशक तक बॉम्बे का सबसे बड़ा मटका कारोबार चलाया।
क्या मटका किंग सीरीज़ सच्ची कहानी पर है?
ढीले तौर पर। इसका हीरो ब्रिज भट्टी काल्पनिक है, लेकिन कहानी मटके के असली उभार और रतन खत्री की ज़िंदगी से प्रेरित है।
मटका क्वीन कौन है?
सीरीज़ में गुलरुख – कृतिका कामरा का किरदार – एक विधवा जो मटका ऑपरेटर बनती है।
कल्याण मटका किसने शुरू किया?
कल्याणजी भगत ने, जिन्होंने 1962 में वर्ली मटका शुरू किया; कल्याण बाज़ार उन्हीं के नाम पर है।
रतन खत्री का निधन कब हुआ?
9 मई 2020 को, मुंबई में, 88 साल की उम्र में।

स्रोत: विकिपीडिया लेख Matka gambling और Ratan Khatri; मटका किंग पर द हॉलीवुड रिपोर्टर इंडिया और द वीक (2026) के लेख।